🦚 श्री कृष्ण चालीसा (Krishna Chalisa)
श्री कृष्ण चालीसा भगवान Krishna की दिव्य लीलाओं, प्रेम, करुणा, ज्ञान और धर्मस्थापना का पावन वर्णन करती है। यह चालीसा भक्तों के जीवन से दुःख, भय, निराशा, मानसिक अशांति और बाधाओं को दूर करने में सहायक मानी जाती है। श्रद्धा और विश्वास के साथ श्री कृष्ण चालीसा का नियमित पाठ करने से जीवन में प्रेम, आनंद, सकारात्मक ऊर्जा और आत्मिक शांति का संचार होता है।
विशेष रूप से जन्माष्टमी, एकादशी तथा गुरुवार के दिन श्री कृष्ण चालीसा का पाठ अत्यंत फलदायी माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से साधक को बुद्धि, भक्ति, सफलता, समृद्धि और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्राप्त होती है। उनकी अनुकंपा से जीवन में सुख-शांति, सौभाग्य और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।

श्री कृष्ण चालीसा एक पवित्र Hindu Devotional स्तोत्र है, जिसमें भगवान Krishna की दिव्य लीलाओं, प्रेम, करुणा, ज्ञान और धर्मस्थापना का सुंदर वर्णन किया गया है। श्री कृष्ण चालीसा हिंदी में भक्तों के जीवन में सुख, प्रेम और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करने का एक प्रभावशाली साधन मानी जाती है।
श्रद्धा और विश्वास के साथ श्री कृष्ण चालीसा का नियमित पाठ करने से जीवन में दुःख, भय, मानसिक तनाव और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है। विशेष रूप से जन्माष्टमी, एकादशी और गुरुवार के दिन श्री कृष्ण चालीसा का पाठ अत्यंत फलदायी माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से साधक को आनंद, प्रेम, समृद्धि, शांति तथा आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है।
दोहा
बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम।
अरुण अधर जनु बिम्बफल, नयन कमल अभिराम॥
पूर्ण इंद्र अरविंद मुख, पीताम्बर शुभ साज।
जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचंद्र महाराज॥
चौपाई
जय यदुनंदन जय जगवंदन।
जय वसुदेव देवकी नंदन॥
जय यशोदा सुत नंद दुलारे।
जय प्रभु भक्तन के रखवारे॥
जय नटनागर नाग नथैया।
कृष्ण कन्हैया धेनु चरैया॥
पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो।
आओ दीनन कष्ट निवारो॥
बंशी मधुर अधर धरि टेरी।
होवे पूर्ण विनय यह मेरी॥
आओ हरि पुनि माखन चाखो।
आज लाज भारत की राखो॥
गोल कपोल चिबुक अरुनारे।
मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥
राजित राजीव नयन विशाला।
मोर मुकुट वैजयंती माला॥
कुंडल श्रवण पीत पट आछे।
कटि किंकिणी काछनि काछे॥
नील जलज सुंदर तनु सोहे।
छवि लखि सुर नर मुनि मन मोहे॥
मस्तक तिलक अलक घुँघराले।
आओ कृष्ण बांसुरी वाले॥
करि पय पान पूतनहि तार्यो।
अघ बक कागासुर संहार्यो॥
मधुवन जलत अगिन जब ज्वाला।
भै शीतल लखतहि नंदलाला॥
सुरपति जब ब्रज चढ़्यो रिसाई।
मुसर धार वारि वर्षाई॥
लगत लगत ब्रज चहुँ दिसि घेरे।
गोवर्धन नख धारि बचाए॥
लखि यशोदा मन भ्रम अधिकाई।
मुख मंह चौदह भुवन दिखाई॥
दुष्ट कंस अति उधम मचायो।
कोटि कमल जब फूल मंगायो॥
नाथि कालियहि तब तुम लीन्हे।
चरण चिन्ह दे निर्भय कीन्हे॥
करि गोपिन संग रास विलासा।
सबकी पूर करी अभिलाषा॥
केतिक महा असुर संहार्यो।
कंसहि केस पकड़ि दै मार्यो॥
मात पिता की बंदि छुड़ाई।
उग्रसेन कहँ राज दिलाई॥
महिमा कहि न सकत बलिहारी।
शेष सहस मुख गात अपारी॥
दीन सुदामा के दुख टार्यो।
तंदुल तीन मुट्ठी मुख डार्यो॥
प्रेम के साग विदुर घर मांगे।
दुर्योधन के मेवा त्यागे॥
लखि प्रेम की महिमा भारी।
ऐसे श्याम दीन हितकारी॥
भारत में पार्थ रथ हाँके।
लिए चक्र कर नहीं बल थाके॥
निज गीता के ज्ञान सुनाए।
भक्त हृदय सुधा बरसाए॥
मीरा थी ऐसी मतवाली।
विष पी गई बजाकर ताली॥
राणा भेजा साँप पिटारी।
शालिग्राम बने बनवारी॥
अब तो हरि दया करो भारी।
दीननाथ मैं दास तुम्हारी॥
जो यह पढ़े कृष्ण चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
दोहा
यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करे उर धार।
अष्ट सिद्धि नव निधि फल, लहै पदारथ चार॥
