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Shri Ganesh Chalisa Full Path in Hindi|श्री गणेश चालीसा पाठ 🕉️

🔱 श्री गणेश चालीसा 🙏

श्री गणेश चालीसा (Ganesh Chalisa) भगवान गणेश की महिमा, बुद्धि, सिद्धि, शुभता और विघ्नहर्ता स्वरूप का दिव्य वर्णन करती है। यह चालीसा जीवन में आने वाली बाधाओं, रुकावटों, भय, असफलता और मानसिक अशांति को दूर करने में सहायक मानी जाती है। श्रद्धा और विश्वास के साथ गणेश चालीसा का नियमित पाठ करने से बुद्धि की वृद्धि, कार्यों में सफलता, सकारात्मक ऊर्जा और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। विशेष रूप से बुधवार, चतुर्थी तिथि (संकष्टी चतुर्थी) और किसी भी शुभ कार्य के प्रारंभ से पहले गणेश चालीसा का पाठ अत्यंत फलदायी माना जाता है। भगवान विघ्नहर्ता की कृपा से साधक के जीवन से बाधाएँ दूर होती हैं और सुख, समृद्धि तथा सिद्धि की प्राप्ति होती है। 🙏

Ganesh Chalisa
Ganesh Chalisa

श्री गणेश चालीसा (Shri Ganesh Chalisa) एक पवित्र Hindu devotional स्तोत्र है, जिसमें भगवान श्री गणेश की महिमा, बुद्धि, सिद्धि, विघ्नहर्ता स्वरूप और करुणा का सुंदर वर्णन किया गया है। Ganesh Chalisa Hindi में गणपति बप्पा की आराधना और कृपा प्राप्त करने का अत्यंत प्रभावशाली साधन मानी जाती है। श्रद्धा और विश्वास के साथ श्री गणेश चालीसा का नियमित पाठ करने से जीवन के विघ्न, बाधाएँ, मानसिक तनाव और नकारात्मक परिस्थितियाँ दूर होती हैं।

विशेष रूप से बुधवार, गणेश चतुर्थी, संकष्टी चतुर्थी और किसी भी शुभ कार्य के प्रारंभ से पहले गणेश चालीसा का पाठ अत्यंत फलदायी माना गया है। भगवान गणेश की कृपा से साधक को बुद्धि, विवेक, सफलता, सुख-समृद्धि तथा आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है। गणपति बप्पा को प्रथम पूज्य देव माना गया है, इसलिए उनकी उपासना जीवन में शुभारंभ, स्थिरता और सफलता का मार्ग प्रशस्त करती है।

दोहा
जय गणपति सद्गुण सदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥
चौपाई
जय जय जय गणपति गणराजू।
मंगल भरण करन शुभ काजू॥
जय गजवदन सदन सुखदाता।
विश्व विनायक बुद्धि विधाता॥
वक्रतुंड शुचि शुंड सुहावन।
तिलक त्रिपुंड भाल मन भावन॥
राजत मणि मुक्तन उर माला।
स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥
पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूला।
मोदक भोग सुगंधित फूला॥
सुंदर पीताम्बर तन साजित।
चरण पादुका मुनि मन राजित॥
धनि शिवसुवन षडानन भ्राता।
गौरी लालन विश्व-विख्याता॥
ऋद्धि सिद्धि तव चंवर डुलावे।
मूषक वाहन सोहत द्वारे॥
कहौं जन्म शुभ कथा तुम्हारी।
अति शुचि पावन मंगलकारी॥
एक समय गिरिराज कुमारी।
पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी॥
भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा।
तब पहुंच्यो तुम धरि द्विज रूपा॥
अतिथि जानि कै गौरी सुखारी।
बहु विधि सेवा करी तुम्हारी॥
अति प्रसन्न ह्वै तुम वर दीन्हा।
मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥
मिलहि पुत्र तुहि बुद्धि विशाला।
बिना गर्भ धारण यहि काला॥
गणनायक गुण ज्ञान निधाना।
पूजित प्रथम रूप भगवाना॥
अस कही अंतर्धान रूप ह्वै।
पालना पर बालक स्वरूप ह्वै॥
बनि शिशु रुदन जबहि तुम ठाना।
लखि मुख सुख नहि गौरी समाना॥
सकल मगन सुख मंगल गावहिं।
नभ ते सुरन सुमन वर्षावहिं॥
शंभु उमा बहुदान लुटावहिं।
सुर मुनिजन सुत देखन आवहिं॥
लखि अति आनंद मंगल साजा।
देखन भी आए शनि राजा॥
निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं।
बालक देखन चाहत नाहीं॥
गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो।
उत्सव मोर न शनि तुहि भायो॥
कहत लगे शनि मन सकुचाई।
का करिहौं शिशु मोहि दिखाई॥
नहिं विश्वास उमा उर भयऊ।
शनि सों बालक देखन कहयऊ॥
पड़तहि शनि दृग कोन प्रकाशा।
बालक सिर उड़ि गयो आकाशा॥
गिरिजा गिरी विकल ह्वै धरणी।
सो दुख दशा गई नहि बरनी॥
हाहाकार मच्यो कैलासा।
शनि कीन्हों लखि सुत को नाशा॥
तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधाए।
काटि चक्र सो गज सिर लाए॥
बालक के धड़ ऊपर धारयो।
प्राण मंत्र पढ़ि शंकर डारयो॥
नाम गणेश शंभु तब कीन्हे।
प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हे॥
बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा।
पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥
चले षडानन भरमि भुलाई।
रचे बैठ तुम बुद्धि उपाई॥
चरण मातु-पितु के धर लीन्हें।
तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥
धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे।
नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥
तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई।
शेष सहस मुख सके न गाई॥
मैं मति हीन मलीन दुखारी।
करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी॥
भजत रामसुंदर प्रभुदासा।
जग प्रयाग ककरा दुर्वासा॥
अब प्रभु दया दीन पर कीजै।
अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै॥
दोहा
श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करे कर ध्यान।
नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सम्मान॥

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